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भाषा के नाम पर बंटता भारत: क्या अपने ही देश में रोज़गार के लिए अपनी पहचान छोड़नी पड़ेगी?

भारत में भाषा, क्षेत्रीय पहचान, प्रवासी मजदूरों की सुरक्षा और इंसानियत पर एक ऐसा सवाल, जिसे हमें अनसुना नहीं करना चाहिए। कभी-कभी किसी देश की सबसे बड़ी समस्या उसके आंकड़ों में नहीं, बल्कि उन लोगों की आंखों में दिखाई देती है, जिन्हें हर दिन अपनी पहचान साबित करनी पड़ती है। कभी किसी रेलवे स्टेशन पर खड़ी मां की आंखों में। कभी किसी छोटे से कमरे में बैठकर घर फोन करने वाले मजदूर की आवाज में। कभी किसी ऑटो चालक के चेहरे पर दिखाई देने वाली उस चिंता में, जो दिनभर मेहनत करने के बाद भी यह नहीं जानता कि कल उसका रोजगार सुरक्षित रहेगा या नहीं। जरा एक तस्वीर की कल्पना कीजिए। बिहार के किसी छोटे से गांव में एक मां अपने बेटे को रेलवे स्टेशन पर विदा करने आई है। बेटे के कंधे पर एक पुराना बैग है। जेब में कुछ पैसे हैं और आंखों में एक उम्मीद है कि इस बार शहर जाकर कुछ बेहतर कमाएगा। मां जाते-जाते बस इतना कहती है— "बेटा, अपना ख्याल रखना। समय पर खाना खा लेना। और पैसे की जरूरत हो तो बता देना।" बेटा मुस्कुराकर कहता है— "चिंता मत करो मां, सब ठीक हो जाएगा।" ट्रेन चल पड़ती है। मां प्लेटफॉर्म पर खड़ी ...
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